भारतीय संसद में बजट: समझिए पूरी प्रक्रिया और इसका महत्व;

आज के इस आर्टिकल में दोस्तों आपको भारतीय संसद में बजट की संपूर्ण प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिलेगी – कैसे अगस्त-सितंबर से शुरू होकर हलवा सेरेमनी तक बजट तैयार होता है, वित्त मंत्री कैसे 1 फरवरी को संसद में इसे पेश करते हैं, और फिर कैसे लोकसभा और राज्यसभा में चर्चा, अनुदान मांगों पर बहस, कटौती प्रस्ताव, और विनियोग विधेयक के जरिए यह पास होता है।

आप समझेंगे कि क्यों बजट सिर्फ एक वित्तीय दस्तावेज नहीं बल्कि देश की दिशा तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण साधन है, जो किसानों, युवाओं, और आम नागरिकों की जिंदगी को सीधे प्रभावित करता है। साथ ही आपको मिलेंगी रोचक ऐतिहासिक जानकारियां, परंपराएं और 6 महत्वपूर्ण सवालों के जवाब जो बजट को समझने में आपकी मदद करेंगे।

बजट क्या होता है और क्यों है जरूरी?

भारतीय संसद में बजट जब फरवरी का महीना आता है, पूरे देश की निगाहें संसद भवन पर टिक जाती हैं। टीवी चैनल्स पर बजट की चर्चा होने लगती है, अखबारों में विशेष परिशिष्ट छपते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये बजट होता क्या है और इसे बनाने से लेकर पास करने तक का सफर कैसा होता है? आसान भाषा में कहें तो बजट सरकार का वो वार्षिक वित्तीय दस्तावेज है जिसमें आने वाले एक साल में सरकार कितना पैसा कमाएगी और कहां-कहां खर्च करेगी, इसका पूरा लेखा-जोखा होता है। ये सिर्फ एक कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि देश की आर्थिक दिशा तय करने वाला सबसे अहम दस्तावेज है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 में इसे ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ कहा गया है। यह दस्तावेज बताता है कि सरकार टैक्स, रेलवे, डाक सेवा और अन्य स्रोतों से कितनी आमदनी करेगी और किसानों, गरीबों, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा और विकास योजनाओं पर कितना खर्च होगा। भारतीय संसद में बजट

बजट बनाने की शुरुआत कैसे होती है?

बजट बनाना कोई रातोंरात का काम नहीं है। इसकी तैयारी तो लगभग छह महीने पहले से शुरू हो जाती है। आमतौर पर अगस्त-सितंबर से ही इसका काम शुरू हो जाता है। सबसे पहले वित्त मंत्रालय सभी केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और विभागों को एक सर्कुलर भेजता है। इस सर्कुलर में उन्हें अगले वित्तीय वर्ष के लिए अपने अनुमानित खर्च का ब्यौरा देने को कहा जाता है। हर मंत्रालय अपनी-अपनी योजनाओं, जरूरतों और प्राथमिकताओं के आधार पर बजट की मांग रखता है।

भारतीय संसद में बजट इसके बाद वित्त मंत्रालय का आर्थिक मामलों का विभाग और व्यय विभाग इन सभी मांगों की छानबीन करता है। इस दौरान किसानों, उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों और विभिन्न संगठनों से भी बातचीत होती है। उनके सुझाव लिए जाते हैं, हालांकि ये प्रक्रिया ज्यादातर बंद दरवाजों के पीछे होती है। दिसंबर-जनवरी तक बजट लगभग तैयार हो जाता है।

इसी दौरान एक खास परंपरा निभाई जाती है ‘हलवा सेरेमनी’। नॉर्थ ब्लॉक में एक बड़ी कढ़ाई में हलवा बनाया जाता है और बजट तैयार करने में जुटे सभी अधिकारियों को परोसा जाता है। यह समारोह इस बात का संकेत होता है कि बजट को अंतिम रूप मिल चुका है और अब इसकी छपाई शुरू होगी। भारतीय संसद में बजट

हलवा समारोह के बाद एक ‘लॉक-इन’ अवधि शुरू होती है। इस दौरान बजट से जुड़े सभी अधिकारी नॉर्थ ब्लॉक में ही रहते हैं और उन्हें बाहरी दुनिया से संपर्क करने की मनाही होती है। यह गोपनीयता इसलिए जरूरी है ताकि बजट के प्रावधान लीक न हों। भारतीय संसद में बजट https://www.indiabudget.gov.in/ – आधिकारिक बजट पोर्टल

संसद में बजट पेश करने की प्रक्रिया

हर साल 1 फरवरी को बजट पेश किया जाता है। यह परंपरा 2017 से शुरू हुई। इससे पहले बजट फरवरी के आखिरी दिन शाम 5 बजे पेश होता था, जो ब्रिटिश काल से चली आ रही परंपरा थी। बजट पेश करने के दिन सुबह वित्त मंत्री राष्ट्रपति भवन जाते हैं और राष्ट्रपति से अनुमति लेते हैं। यहां एक और दिलचस्प परंपरा है – राष्ट्रपति वित्त मंत्री को दही-चीनी खिलाते हैं, जो शुभकामना का प्रतीक माना जाता है।

इसके बाद सुबह 10 बजे कैबिनेट की बैठक होती है, जहां बजट को मंजूरी दी जाती है। फिर 11 बजे वित्त मंत्री लोकसभा में बजट भाषण शुरू करते हैं। यह भाषण आमतौर पर डेढ़ से दो घंटे तक चलता है, जिसमें सरकार की नीतियां, योजनाएं, टैक्स में बदलाव और आर्थिक लक्ष्य बताए जाते हैं।2019 से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पारंपरिक ब्रीफकेस की जगह ‘बही-खाता’ लेकर जाने की परंपरा शुरू की। 2021 में उन्होंने पहला पेपरलेस बजट टैबलेट पर पेश किया।

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भारतीय संसद में बजट को पास कैसे किया जाता है?

बजट पेश होने के बाद असली प्रक्रिया शुरू होती है। यह कई चरणों में पूरी होती है:

पहला चरण: सामान्य चर्चा

भारतीय संसद में बजट बजट पेश होने के बाद 2-3 दिनों तक लोकसभा और राज्यसभा दोनों में सामान्य चर्चा होती है। इसमें सांसद सरकार की आर्थिक नीतियों पर अपने विचार रखते हैं। इस स्तर पर किसी खास मद पर विस्तृत चर्चा नहीं होती, बल्कि समग्र बजट के बारे में बात होती है। इस चरण में मतदान नहीं होता।

दूसरा चरण: अनुदानों की मांगों पर चर्चा

यह सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। हर मंत्रालय के लिए अलग-अलग अनुदान मांगें होती हैं। इन मांगों पर विस्तृत चर्चा होती है। सांसद ‘कटौती प्रस्ताव’ लाकर किसी भी मंत्रालय के बजट में कटौती की मांग कर सकते हैं। कटौती प्रस्ताव तीन तरह के होते हैं – नीतिगत कटौती (सरकार की नीति से असहमति जताने के लिए, मांग को घटाकर 1 रुपये करना), सांकेतिक कटौती (किसी खास मुद्दे को उठाने के लिए, 100 रुपये की कटौती) और आर्थिक कटौती (जहां वास्तव में खर्च कम करने की मांग हो)। भारतीय संसद में बजट

यह ध्यान देने वाली बात है कि केवल लोकसभा में ही अनुदानों की मांगों पर मतदान होता है। राज्यसभा सिर्फ चर्चा कर सकती है, उसे न तो बदलाव करने का अधिकार है और न ही वोट देने का। भारतीय संसद में बजट

तीसरा चरण: स्थायी समितियों की भूमिका

बजट पेश होने के बाद विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों को संबंधित विभागीय स्थायी समितियों के पास भेजा जाता है। वर्तमान में 24 विभाग-संबंधी स्थायी समितियां हैं। ये समितियां हर मंत्रालय के बजट की गहराई से जांच करती हैं और अपनी रिपोर्ट देती हैं। इसी बीच दोनों सदन 3-4 हफ्तों के लिए रिसेस में चले जाते हैं ताकि समितियां अपना काम पूरा कर सकें।

चौथा चरण: विनियोग विधेयक और वित्त विधेयक

अनुदानों की मांगों पर मतदान के बाद ‘विनियोग विधेयक’ (Appropriation Bill) पेश किया जाता है। यह विधेयक सरकार को भारत की संचित निधि से पैसा निकालने की अनुमति देता है। इसके बिना सरकार एक भी रुपया खर्च नहीं कर सकती। साथ ही ‘वित्त विधेयक’ (Finance Bill) भी पेश किया जाता है, जिसमें टैक्स से जुड़े सभी प्रस्ताव होते हैं। संविधान के मुताबिक, इस विधेयक को 75 दिन के अंदर पास होना जरूरी है।

भारतीय संसद में बजट चूंकि बजट एक मनी बिल है, इसलिए इसे पहले लोकसभा में पास होना आवश्यक है। राज्यसभा इस पर सिर्फ 14 दिन तक विचार कर सकती है। अगर राज्यसभा कोई सुझाव देती है, तो लोकसभा चाहे तो उसे मान सकती है या नहीं भी। अंतिम निर्णय लोकसभा का ही होता है।

लेखानुदान की व्यवस्था

बजट पूरी तरह पास होने में समय लगता है, लेकिन सरकार का काम तो चलता रहना चाहिए ना? इसीलिए ‘लेखानुदान’ (Vote on Account) की व्यवस्था है। इसके तहत लोकसभा सरकार को 2 महीने के खर्च के लिए अनुमति दे देती है। यह आमतौर पर साल के कुल बजट का छठा हिस्सा होता है। चुनाव के साल में, जब पुरानी लोकसभा भंग हो रही होती है, तब लेखानुदान की अवधि बढ़ाकर 3-5 महीने तक की जा सकती है।

बजट सत्र कैसे चलता है?

बजट सत्र साल का पहला संसदीय सत्र होता है। 2025 में यह 31 जनवरी को शुरू हुआ और 4 अप्रैल को समाप्त हुआ। यह दो भागों में बांटा जाता है:

  • पहला भाग (जनवरी के आखिर से फरवरी मध्य तक): इसमें राष्ट्रपति का अभिभाषण, आर्थिक सर्वेक्षण और बजट पेश होता है। बजट पर सामान्य चर्चा होती है।
  • दूसरा भाग (मार्च से अप्रैल): इसमें अनुदान मांगों पर विस्तृत चर्चा, कटौती प्रस्ताव, विनियोग विधेयक और वित्त विधेयक पास होते हैं। 31 मार्च से पहले सारा वित्तीय काम पूरा हो जाना जरूरी है, क्योंकि 1 अप्रैल से नया वित्तीय वर्ष शुरू हो जाता है।
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बजट का महत्व क्यों है?

भारतीय संसद में बजट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। यह देश की दिशा तय करता है। किसान को सस्ती ब्याज दर पर कर्ज मिलेगा या नहीं, युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे या नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश होगा या नहीं – ये सब बजट में तय होता है। बजट के जरिए सरकार अपनी प्राथमिकताएं बताती है। अगर किसी क्षेत्र को ज्यादा पैसा मिल रहा है, तो समझ लीजिए कि सरकार उस पर फोकस कर रही है। टैक्स में बदलाव से आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ता है। लोकतंत्र में बजट की सबसे बड़ी खूबी यह है कि सरकार को संसद के सामने हर पैसे का हिसाब देना पड़ता है। यह जवाबदेही लोकतंत्र की जान है।

बजट से जुड़ी कुछ खास बातें

मोरारजी देसाई ने सबसे ज्यादा 10 बार बजट पेश किया है। निर्मला सीतारमण 2025 में अपना 8वां बजट पेश करके प्रणब मुखर्जी के बराबर पहुंच गई हैं। इंदिरा गांधी एकमात्र महिला प्रधानमंत्री थीं जिन्होंने वित्त मंत्री बनकर बजट पेश किया। 1973 से पहले रेलवे बजट अलग पेश होता था, लेकिन 2017 से इसे आम बजट में मिला दिया गया। 2000 से पहले बजट शाम 5 बजे पेश होता था (ब्रिटिश समय के हिसाब से), लेकिन अब सुबह 11 बजे होता है।

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निष्कर्ष Conclusion

भारतीय संसद में बजट सिर्फ एक सरकारी दस्तावेज नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की आशाओं, सपनों और जरूरतों का प्रतिबिंब है। इसकी तैयारी से लेकर संसद में पास होने तक का हर कदम लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उदाहरण है। यह प्रक्रिया भले ही लंबी और जटिल लगे, लेकिन यह सुनिश्चित करती है कि जनता का पैसा सही जगह खर्च हो और सरकार हर फैसले के लिए जवाबदेह रहे। अगली बार जब आप बजट की खबरें देखें, तो याद रखिएगा कि इसके पीछे महीनों की मेहनत और एक सुव्यवस्थित लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।

बजट कब और कौन पेश करता है?

बजट हर साल 1 फरवरी को वित्त मंत्री द्वारा लोकसभा में पेश किया जाता है। इसके बाद इसे राज्यसभा में भी रखा जाता है। भारतीय संसद में बजट

बजट को पास होने में कितना समय लगता है?

संविधान के अनुसार वित्त विधेयक को 75 दिन के अंदर पास होना जरूरी है। आमतौर पर मार्च के अंत तक पूरी प्रक्रिया पूरी हो जाती है। भारतीय संसद में बजट

राज्यसभा की बजट में क्या भूमिका है?

राज्यसभा केवल बजट पर चर्चा कर सकती है। उसे न तो बदलाव करने का अधिकार है और न ही मतदान का, क्योंकि बजट एक मनी बिल है।

लेखानुदान (Vote on Account) क्या होता है?

यह एक अस्थायी व्यवस्था है जिसके तहत बजट पास होने तक के लिए सरकार को 2 महीने के खर्च की अनुमति दी जाती है। भारतीय संसद में बजट

अंतरिम बजट और पूर्ण बजट में क्या अंतर है?

भारतीय संसद में बजट चुनाव के साल में जब सरकार का कार्यकाल खत्म होने वाला हो, तब अंतरिम बजट पेश किया जाता है जो केवल जरूरी खर्चों को कवर करता है।

बजट में कटौती प्रस्ताव क्या होता है?

भारतीय संसद में बजट यह सांसदों द्वारा किसी मंत्रालय के बजट में कटौती की मांग करने का तरीका है। यह तीन प्रकार का होता है – नीतिगत, सांकेतिक और आर्थिक कटौती।

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