Durga Puja 2025 जानें इसके पीछे की कहानी दुर्गा पूजा का त्योहार पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, खासकर पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और बिहार में इसकी अलग ही छटा देखने को मिलती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां दुर्गा की भव्य मूर्तियों को बनाने में एक ऐसी परंपरा जुड़ी हुई है जो सुनने में अजीब लगती है, लेकिन इसके पीछे गहरा धार्मिक और सामाजिक संदेश छुपा है? जी हां, मां दुर्गा की मूर्ति बनाने में वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा के पीछे की पूरी कहानी।
मां दुर्गा की मूर्ति बनाने में कौन-कौन सी मिट्टी का होता है इस्तेमाल?
पारंपरिक रूप से मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए कई अलग-अलग स्थानों से मिट्टी एकत्र की जाती है। इनमें गंगा नदी के किनारे की मिट्टी, राजा के आंगन की मिट्टी, शक्तिपीठ की मिट्टी, दीमक की बांबी की मिट्टी, सूअर के दांत की मिट्टी, श्मशान घाट की मिट्टी और वेश्यालय के आंगन की मिट्टी शामिल है। हर मिट्टी का अपना एक विशेष महत्व और प्रतीकात्मक अर्थ होता है।

यह परंपरा सदियों पुरानी है और विशेष रूप से बंगाल में आज भी इसका पालन किया जाता है। हालांकि देश के उत्तर-पूर्वी हिस्सों में यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है, लेकिन बंगाल में अभी भी मूर्तिकार दशहरा की शुरुआत में इन स्थानों से मिट्टी एकत्र करने जाते हैं।
वेश्यालय की मिट्टी को ‘पुण्य माटी’ क्यों कहा जाता है?
वेश्यालय के बाहर की मिट्टी को “पुण्य माटी” के नाम से जाना जाता है और यह निषिद्ध पल्ली या वर्जित क्षेत्रों से आती है। मूर्ति बनाने वाले पुजारी को वेश्या से इस मिट्टी की भीख मांगनी होती है। यह परंपरा सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि इसके पीछे एक गहरा दार्शनिक और सामाजिक संदेश है।
Durga Puja 2025 इस परंपरा के पीछे की धार्मिक मान्यता
इस परंपरा के पीछे की मुख्य मान्यता यह है कि जब कोई पुरुष वेश्यालय में प्रवेश करता है, तो वह अपनी सारी सदाचारिता, पवित्रता और नैतिकता उसके दरवाजे पर ही छोड़ देता है। इसलिए माना जाता है कि वेश्यालय के बाहर की मिट्टी में समाज के सभी लोगों की पवित्रता और सदाचार जमा हो जाते हैं, जो इस मिट्टी को सबसे पवित्र बना देते हैं।
यह एक प्रतीकात्मक तरीका है यह बताने का कि जो लोग समाज में तिरस्कृत हैं, उनके द्वार पर भी पवित्रता बसती है। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि कोई भी इंसान पूरी तरह से अपवित्र नहीं होता।
Durga Puja 2025 एक पौराणिक कथा और इसका संदेश
कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और मां पार्वती ने देखा कि समाज में वेश्याओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है, हालांकि समाज के तथाकथित सभ्य लोग ही उनके पास जाते हैं। इस विडंबना को देखकर मां पार्वती ने इच्छा व्यक्त की कि उनकी मूर्ति में वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल हो। भगवान शिव ने यह इच्छा पूरी की और तब से यह परंपरा चली आ रही है।
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समाज को मिलने वाला संदेश
यह परंपरा वास्तव में समाज को एक बहुत बड़ा संदेश देती है। यह हमें याद दिलाती है कि:
- समानता का पाठ: मां दुर्गा जैसी पवित्र देवी की मूर्ति में वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि ईश्वर की नजर में सभी समान हैं। कोई भी व्यक्ति अछूत या अपवित्र नहीं है।
- सामाजिक पाखंड पर प्रहार:जो लोग दिन में समाज में नैतिकता का ढोंग करते हैं और रात में वेश्यालय जाते हैं, इस परंपरा के माध्यम से उनकी दोहरी नैतिकता पर सवाल उठाया जाता है।
- करुणा और समावेशिता: यह परंपरा समाज के हर वर्ग को सम्मान देने का संदेश देती है, चाहे वे किसी भी परिस्थिति में क्यों न हों।
- पुनः स्वीकार्यता:मूर्ति में इस मिट्टी का इस्तेमाल यह संकेत देता है कि समाज में हर किसी को दूसरा मौका और सम्मान मिलना चाहिए।
आधुनिक संदर्भ में इस परंपरा की प्रासंगिकता
आज के समय में जब समाज में भेदभाव और असमानता अभी भी मौजूद है, यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि मानवता सबसे बड़ा धर्म है। इतिहास के पीएचडी शोधकर्ता कौशिक नंदी बताते हैं कि यह सदियों पुरानी परंपरा है जो आज भी जारी है।यह परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि हर इंसान में अच्छाई और पवित्रता है, चाहे समाज उसे किसी भी नजर से देखे।
दुर्गा पूजा का वास्तविक संदेश
दुर्गा पूजा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव है। मां दुर्गा ने महिषासुर जैसे शक्तिशाली राक्षस को पराजित किया था। उसी तरह, यह परंपरा हमें समाज में व्याप्त भेदभाव और पाखंड रूपी राक्षसों को पराजित करने की प्रेरणा देती है।वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल दरअसल यह दर्शाता है कि मां दुर्गा सभी की रक्षा करती हैं – चाहे वो राजा हो या रंक, चाहे वो समाज में सम्मानित हो या तिरस्कृत। यह शक्ति का, करुणा का और समावेशिता का प्रतीक है।
निष्कर्ष
मां दुर्गा की मूर्ति में वेश्यालय की मिट्टी के इस्तेमाल की यह परंपरा हमारी संस्कृति की गहराई को दर्शाती है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि धर्म और आस्था का असली उद्देश्य मानवता की सेवा और सभी को समान सम्मान देना है। यह एक ऐसी परंपरा है जो समाज में व्याप्त ऊंच-नीच, छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत संदेश है।
जब हम दुर्गा पूजा मनाते हैं, तो हमें इस परंपरा के पीछे छिपे गहरे अर्थ को समझना चाहिए और समाज में समानता, करुणा और मानवता के मूल्यों को अपनाना चाहिए। आखिरकार, यही मां दुर्गा का सच्चा आशीर्वाद है – एक ऐसा समाज जहां हर इंसान को सम्मान और अवसर मिले, चाहे वो किसी भी पृष्ठभूमि से आता हो।इस दुर्गा पूजा में आइए हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम समाज में किसी भी प्रकार के भेदभाव को खत्म करेंगे और सभी के साथ समानता और सम्मान का व्यवहार करेंगे। यही मां दुर्गा की असली पूजा है।